
कुछ चीज़ें होती हैं जो हम से छूट जाती हैं, कभी हमारे हाथ से फिसल जाती हैं, कभी उन्हें हमसे छीन लिया जाता है; कुछ चीज़ें होती हैं जो हमारे पास रह जाती हैं और छूटी हुई, जा चुकी चीज़ों, लोगों, जगहों की याद हमें दिलाती रहती हैं। कुछ सपने होते हैं हमारे, कुछ इच्छाएँ होती हैं, कुछ नहीं किए जा सके काम होते हैं, जो हमें अकसर बुलाते रहते हैं। प्रेम होता है, जिसके दोनों तरफ़ पीड़ा होती है—पा लेने की अपनी, न पाने की अपनी। ऐसी ही चीज़ों से हम बनते हैं, हमारी दुनिया बनती है। विनय सौरभ का कवि जैसे इस दुनिया की हर खुली-अधखुली खिड़की में झाँकता-देखता फिरता रहता है। हर किसी के अनुभवों का उदास-सा विस्तार मालूम होतीं इस संग्रह की कविताएँ जीवन के अधूरेपन की तरफ़ इतने अनायास ढंग से इशारा करती हैं कि हम अपनी तथाकथित पूर्णताओं को लेकर सन्देह से भर उठते हैं। स्मृतियों, विडम्बनाओं और मध्यवर्गीय जीवन की साँवली उदासियों में अपनी कविता को आकार देनेवाले विनय सौरभ के इस संग्रह में वे कविताएँ भी हैं जो राजनीति, सत्ता और बाजार की आक्रामकताओं की आलोचना करती हैं; और उनके जादू को समझने, उनके तिलिस्म को तोड़ने की कोशिश भी करती हैं। कविता-प्रेमी पाठक को इस किताब में ऐसे अनेक स्थल मिलते हैं जहाँ वह ठहरकर अपने आप और अपनी दुनिया को दुबारा से देखना चाहता है।
| Brand Name | Rajkamal Prakashan |
| Manufacturer | Rajkamal Prakashan |
| Item Type | Poetry · Books |
| Shipping Weight | 160 g |
| Package Dimensions | 21.5 × 13.9 × 1.5 cm |
| Category | Books › Literature & Fiction › Poetry |
| Category Rank | #362,275 in Books |
| Marketplace Rating | 4.6 out of 5 (12 ratings on the source marketplace) |
| EAN | 9789360861483 |