
आधुनिक युग के विद्रोही कवियों भी रामधारी सिंह 'दिनकर' का महत्त्वपूर्ण स्थान है, और इसकी मिसाल है 'परशुराम की प्रतीक्षा'। यह पुस्तक एक खंडकाव्य है। इसकी रचना 1962 में भारत-चीन युद्ध के पश्चात् हुई थी। इसके ज़रिए राष्ट्रकवि का सन्देश है कि हमें नैतिक मूल्यों की रक्षा करते हुए अपने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा ख़ातिर सतत जागरूक रहना चाहिए। युद्धभूमि में शत्रु का विनाश करने के लिए हिंसा अनुचित नहीं है। दिनकर परशुराम धर्म को भारत की जनता का धर्म मानते हैं। परशुराम को भारत की जागरूक जनता का प्रतीक मानते हैं। इसलिए पौराणिक पृष्ठभूमि में परशुराम के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते लिखते हैं—''लोहित में गिरकर जब परशुराम का कुठार पाप-मुक्त हो गया, तब उस कुठार से उन्होंने एक सौ वर्ष तक लड़ाइयाँ लड़ीं और समन्तपंचक में पाँच शोणित-ह्रद बनाकर उन्होंने पितरों का तर्पण किया। जब उनका प्रतिशोध शान्त हो गया, उन्होंने कोंकण के पास पहुँचकर अपना कुठार समुद्र में फेंक दिया और वे नवनिर्माण में प्रवृत्त हो गए। भारत का वह भाग, जो अब कोंकण और केरल कहलाता है, भगवान् परशुराम का ही बसाया हुआ है। लोहित भारतवर्ष का बड़ा ही पवित्र भाग है। पुराकाल में वहाँ परशुराम का पापमोचन हुआ था। आज एक बार फिर लोहित में ही भारतवर्ष का पाप छूटा है। इसीलिए, भविष्य मुझे आशापूर्ण दिखाई देता है— “ताण्डवी तेज फिर से हुंकार उठा है, लोहित में था जो गिरा, कुठार उठा है।” 'परशुराम की प्रतीक्षा' राष्ट्रकवि दिनकर की ऐसी कृति है जो भारत-चीन सीमा पर युद्ध के हालात बनते ही समीचीन हो जाती है। हर युग में नई उम्मीद और नए प्रतिरोध के साथ पढ़ी जानेवाली एक काजलयी कृति।.
| Brand Name | Rajkamal Prakashan |
| Manufacturer | Lokbharti Prakashan |
| Item Type | Poetry · Books |
| Shipping Weight | 90 g |
| Package Dimensions | 19.8 × 12.9 × 0.7 cm |
| Category | Books › Literature & Fiction › Poetry |
| Category Rank | #20,334 in Books |
| Marketplace Rating | 4.5 out of 5 (744 ratings on the source marketplace) |
| EAN | 9788194833567 |