![Prem Prakriya Hai (Hindi) [Paperback] Bhubneshwar Upadhyay](https://m.media-amazon.com/images/I/61hcJ5K5SSL._SX1200_.jpg)
यदि कोई मुझसे पूछे कि मानवीय जीवन की सबसे चमत्कृत कर देने वाली घटना कौन सी है? तो निस्संदेह मैं कहूँगा — प्रेम! प्रेम— प्रेम का होना तो ठीक वैसे ही है जैसे कोई रोबोट यकायक सोचने लगे और अपने तय आदेशों को नकारते हुए उस राह पर चल पड़े जो उसकी थी ही नहीं। प्रेम भी कुछ कुछ ऐसा ही है, जैसे एक व्यक्ति का मोहमाया छोड़कर पूर्ण अस्तित्व के साथ अपनी वास्तविक चेतना की ओर यकायक लौट पड़ना। वाकी सब तो एक जीवित प्राणी के रूप में मनुष्य की सहजवृत्ति है। एक पूर्व निर्धारित जैविक प्रोग्रामिंग जो प्राणी मात्र के डीएनए में सुरक्षित रहती है जिससे जीवन की प्रक्रिया स्वयं संचालित होती है। जैसे एक माँ को अपने बच्चे के लिए क्या क्या करना है? एक युवा होते पुरुष या एक युवती का एक दूसरे की ओर आकर्षित होना। अपनी प्रजाति और स्वयं को हर प्रकार से जीवित रखने का प्रयास करना। आदि आदि... ! लोग ये कहते कि प्रेम में बुद्धि एकाग्र हो जाती है तब तो बात समझ आती, मगर वे कहते हैं कि बुद्धि शून्य हो जाती है। सुनकर थोड़ा अजीब लगता है कि लोग मानसिक विक्षिप्तता को प्रेम कहते हैं जबकि वह तो पूर्ण चैतन्यता की वस्तु है। हाँ, ये कह सकते हैं कि वह तो चेतन और अवचेतन मन का एकाकार है जहॉं न कोई भय है, न भ्रम, न दुविधा और न कोई संघर्ष। यानि कि प्रेम तो एक परिपक्व और चैतन्य मस्तिष्क का दृढ़संकल्प है। प्रेम तो एक ऐसी अदृश्य ऊर्जा है जो एक ही क्षण में सृष्टि के आरंभ से वर्तमान तक के सभी चैतन्य द्वार खोल देती है तब न जानने को कुछ शेष रहता है और न कुछ पाने को। और फिर जीवन, प्रक्रिया से मुक्त होकर स्वयं प्रकृति हो जाता है या फिर पुरुष। तब प्रेमी सहज ही एक कर्मयोगी हो जाता है और प्रेम, सहज योग में समाधिस्थ होकर चेतन और अवचेतन के मध्य जो माया की दीवार है उसे तोड़ देता है। खैर... प्रेम, शब्द जितना प्रचलित और आम है, इसके मार्ग पर चलते रहना उतना ही कठिन और जटिल है। ये सहज तो बिल्कुल नहीं है, बल्कि ये तो आम रास्ते को छोड़कर अनिश्चितताओं से भरे असमान्य और अनजाने रास्तों पर चलने जैसा है। जहॉं बहुत कुछ ऐसा घटित होने वाला होता है जो अकल्पनीय होता है इसीलिए यहाँ टिके रहने के लिए विवेक, धैर्य और मानसिक दृढ़ता की आवश्यकता होती है, क्षणिक आवेश की नहीं।
| Brand Name | Vichar Prakashan |
| Manufacturer | Vichar Prakashan |
| Item Type | Abuse · Books |
| Shipping Weight | 250 g |
| Package Dimensions | 14 × 21.5 × 1 cm |
| Category | Books › Health, Family & Personal Development › Self-Help › Abuse |
| Category Rank | #212,001 in Books |
| Marketplace Rating | 4.6 out of 5 (12 ratings on the source marketplace) |



