![शेषकथा Sheshkatha [Paperback] Jaya Gupta](https://m.media-amazon.com/images/I/71O-GvbIrzL._SX1200_.jpg)
शेषकथा की रचना भगवान व्यास महाभारत के बाद की कथा है मुझे जो कुछ कहना था, वह युधिष्टिर भीष्म और पांचाली का प्रसंग उठाये बिना भी कहा जा सकता था, तब यह रचना, शायद मुक्तक बनकर रह गयी होती। तो भी, यह सच है कि इसे इस रूप में लाने की मेरी कोई निश्चित योजना नहीं थी। पहले मुझे कैकयी और मंथरा के अनुताप ने आकर्षित किया और 'मंथरा का अनुताप ' 'कैकयी का पश्चाताप 'नामक कवितायें लिखते-लिखते मुझे ऐसा लगा, मानो, बिना फल का विचार किये कर्म करना ही मनुष्य की सारी समस्याओं की जड़ है। इसी क्रम में द्वापर की ओर देखते हुए मैंने युधिष्ठिर को देखा, जो विजय पश्चात कुरुक्षेत्र में विछी हुई लाशों को देख संताप प्रकट करते हैं और अपनी व्यथा भीष्म से निवेदित करते हैं भीष्म के धर्म-कथन से ग्लानि और संताप से मुक्त होते हैं यह कथा युद्धान्त की है। युद्ध के अंत में भी स्वयं भगवान ने युधिष्ठिर से जो कुछ भी कहा , उसका सारांश भी त्रिविध कर्म (कायिक , वाचिक, मानसिक कर्म )के फल को ही उत्तरदायी बताते हुए भाव से कर्म और कर्म से फल हेतु सचेत किया । युद्ध निन्दित और क्रूर है किन्तु युद्ध के होने का उत्तरदायी कौन अधिक है ? वह जिसने अन्याय किया या वह जिसने अन्याय का प्रतिकार किया ? कर्ता कर्मफल से कभी बच नहीं सकता भले इसमें कितना भी समय क्यों न लग जाये , कर्मबीज पुरुस्कार या दंड बनकर कर्ता को मिलेगा ही मिलेगा इन बातों को सोचते-सोचते यह काव्य पूरा हो गया। युधिष्ठिर , भीष्म और द्रोपदी के प्रश्नों का शमन मैंने कृष्ण का आलम्बन लेकर वैसे किया जैसा मैं उसे समझ सकी हूँ। इसलिए, मेरी शेषकथा के युधिष्ठिर , भीष्म ,द्रोपदी और कृष्ण मूलकथा से भिन्न भी हो सकते हैं फिर भी मैंने प्रयास किया है कि युधिष्ठिर , भीष्म ,द्रोपदी और कृष्ण के द्वारा कोई ऐसी बात न कहलवाऊँ , जो द्वापर के अनुकूल न हो। यह शेषकथा मेरी तुच्छ बुद्धि अनुकूल कर्म और उसके प्रभाव का चिंतन मात्र है।
| Brand Name | Kavya Kumud Publishing Media |
| Manufacturer | Kavya Kumud Publishing Media |
| Item Type | Poetry · Books |
| Shipping Weight | 200 g |
| Package Dimensions | 24 × 14 × 4 cm |
| Category | Books › Literature & Fiction › Poetry |
| Category Rank | #370,944 in Books |
| Marketplace Rating | 5.0 out of 5 (7 ratings on the source marketplace) |
| EAN | 9788198551566 |